Saturday, October 6, 2007

थोड़ी सी कविताएं-4


इंतज़ार

बाहर क्यूँ खड़े हो व्यास
भीतर आ जाओ
जिया हूँ तुम्हारे इंतज़ार में
कई सौ साल
बीत चुके हैं कथाओं के कुंभ-महाकुंभ
हार-जीत, संघर्ष-महासंघर्ष, आकांक्षा-महत्वाकांक्षा
सब आए और लौट गए
सारे पात्र तिरोहित हो गए सिवाए इक मेरे
गहरी थी रक्ताभ नदी, तैर ली
ऊंचा था मोक्ष का पहाड़, चढ़ लिया
अब घर में हूँ , अकेला हूँ , आ जाओ
थके नहीं तुम संजय की जिह्वा पर रहते-रहते,
आओ, आराम कर लो
मैंने बिछा रक्खी है चादर , सो जाओ

3 comments:

Anonymous said...

wat is goin to b da result of this
'intezaar'
nd wat if it never ends??


it feels great to go through ur work..but still i ll say dat 'sanwad' is 'sanwad'..m waitin for more poetry..anything on death..

i also did sum work but m mailing you only one image..coz i want u to look at it nd write me sumthing bout it..thnx

gaurav said...

dis anonymous is me..gaurav

shri said...

इंतज़ार कविता ने मन को कुछ इस तरह से touch किया जैसा किसि ने नहीं किया