Thursday, March 20, 2008

मृत्यु के अगल-बगल

ऐसा क्यूं था कि लिखना था जीने का अधिकार और लिखी जा रही थी मृत्यु ?
ऐसा क्यूं था कि लिखना था ईश्वर सर्वज्ञ, सर्वत्र-व्याप्त और सर्वशक्तिमान पर लिखी जा रही थी मृत्यु ?
ऐसा क्यूं था कि लिखना था स्वधर्म पर लिखी जा रही थी मृत्यु?
नियंत्रण की हर कोशिश को असफल करते हुए सुध बार-बार विक्षिप्त हुई भाग रही थी एक ही विषय की ओर जहाँ से सुनती थी मरघट की वीरानी और रास्ता! बस, वही एक नज़र आता था।
यह ढोंग काफ़ी देर तक साथ रहा कि ईश्वर की खोज ही एकमात्र सच है पर सुनहरी मछली की तरह हाथ से हमेशा फिसलता हुआ यह सच एक दिन त्यागना ही पड़ा और मंजिल को शब्दों में बयान करने की योग्यता भी हाथ से छूटती गई। एक निरंतर बढ़ती आश्र्यहीनता और क्रमिक बलहीनता का भाग्य मेरी होनी बनकर रह गया।
किसी से एक बात सुनी थी कि अकिरो कुरोसावा जब पैदा हुए थे तो उनके हाथ ऐसे बंधे हुए थे जैसे प्रार्थना कर रहे हों। हालांकि तब यह सच नहीं लगा था पर अब बार-बार सुध यह रेखांकित करती रहती है कि इसके अलावा कोई सच नहीं हो सकता। लेकिन संशय-विद्या ऐसी है कि पीछा नहीं छोडती। प्रार्थना एक निहायत ही मुश्किल कर्म है। किसी पल की भीत में से कभी-कभार शायद यह उभर आए पर हरी-भरी ज़मीन जैसा यथार्थ अभी तक इसका नहीं बन पाया। कौन जकड़े है ज़मीन की इस मटमैली ककर्षता को ? अपने मिट जाने का डर या फिर मृत्यु?
एक और अपराध काफ़ी देर तक होता रहा है- ख़ुद को दार्शनिक कहलवाने के अहम् का अपराध। दर्शन अर्थात दृश्य और अहसास की सम्यक भूमि पर होने वाली प्रक्रिया पर मेरे पास दृश्यों की कभी न ख़त्म होने वाली अपार श्रृंखलाएं थी। रंग-रूप उभरते, बढ़ते, बदलते और फिर किसी अन्धकार में लुप्त हो जाते। दृश्य की क्षुधा सिनेमा के भीतर ले गई। सैंकडों फिल्में देखने के बाद भी ऐसा एक भी दृश्य नहीं था जो अंधेरे के सामने टिककर खड़ा हो पाता । कुछ प्रिय दृश्य ज़रूर थे पर वक्त पड़ने पर उनमें से कोई भी काम नहीं आता। बस एक अन्धकार ही था -दुनिया के सारे दृश्यों की मृत्यु-शय्या। आँख भी काम की नहीं थी इस एक ऐन्द्रिक जीव की। अगर कोई अहसास था तो मात्र एक ही। ख़ुद का पर ख़ुद को कैसे पकड़ सकता था? एक अंधे मानव की नियति भोगते हुए बार-बार यही डर था कि कहीं अगला कदम ग़लत न रख दूँ, गिर न जाऊं, मर ना जाऊं। आँख ही क्या ऐसी एक भी इन्द्रिय का आसरा नहीं था जिस पर टिक सकता। हाथ, पैर, कान, नाक, त्वचा, कहीं से भी ऐसी उम्मीद नहीं थी कि मेरा जीना सुरक्षित हो सके।
मृत्यु अपने प्रछन्न रूप में मुझ काठ की गुडिया के सारे धागे तोड़ रहीं थी और उसकी इस विपरीत-कलाकारी के सामने एक विशुद्ध भयपूर्ण अनुभव ही था मेरी एक मात्र कमाई। सारे अंहकार त्रस्त, महत्वाकाक्षाएं पस्त। आश्रय केवल ऐन्द्रिक अर्थों में ही नहीं बल्कि अपने अस्तित्व के किसी भी रूप में गैर-हाजिर हो गया था। हाथ जोड़ना भी अपमानजनक, ग्लानिपूर्ण कार्यवाही सी लगती थी। कुरोसावा शायद भाग्यशाली होंगे। मेरे पास भाग्य नाम का कोई सौदा नहीं था। चलना भी चाहता था पर डरता भी था। ईश्वर-संधान की सारी माया यहाँ आकर थम चुकी थी। किसी से कभी 'योगक्षेमं वहाम्यम' के अर्थ पूछने चाहे थे पर अब वो हिम्मत भी जा चुकी थी। ईश्वर(?) ईश्वर से भी बड़ा अहसास था जिसने मुझे एक अजीब दुविधा में बाँध लिया था। मंजिल के मायने ख़त्म हो चुके थे। जीना मजबूरी और प्रलोभन के दो पाटों के बीच कहीं था। मेरे पैरों के नीचे क्या था? ज़मीन? पानी? गहरी खाई? किसी भी सुरक्षा का मतलब नहीं था जो अगले कदम के डर से मुक्त कर सके। भगवान् एक काल्पनिक मुद्दा था पर मैं जहाँ था वो एक घोर व्यावहारिक समस्या थी जो किसी के साथ बांटी नहीं जा सकती थी। चीखो-पुकार भी व्यर्थ की कोशिश थी। आसरे अब थे, अब नहीं थे। कहीं भी टिका नहीं जा सकता था। मौलिक की कल्पना ही एक कोरा झूठ साबित हुई थी। मैं कौन था, किस देस का, किस काल का? कुछ भी निर्मित किया जा सकता था मेरी पहचान के रूप में। कुरुक्षेत्र की लड़ाई में पहले ही दिन मार्रा जाने वाला सिपाही भी मैं हो सकता था, फूको की दुनिया का कोई पागल आदमी भी हो सकता था या फिर कीस्लोव्सकी की फ़िल्म "Three Colours-Blue" की वो लड़की भी हो सकता था जिसे वेश्यावृत्ति एक प्रिय व्यवसाय लगता था पर ग्राहक के रूप में जिसे पिता और भाई कदापि स्वीकार नहीं थे। मेरी पहचान के सारे सूत्र अत्यन्त लचकदार हो गए थे। पर इस पहचान का मैं क्या करता जिसके मेरे लिए कोई मायने नहीं रह गए थे?
काश! यह समस्या जाग्रत तक ही में रहती तो कोई चारा था, पर मर जाने का डर स्वप्नावस्था में भी यूँ ही विद्यमान था। भागने और बचने की सारी कोशिशें मृत्यु के और करीब ले जाती थीं। स्वप्न ज़्यादा असुरक्षा का लोक था। मात्र सोना ही एक सुखकारी क्रिया थी जहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था। न कोई डर था। न कोई दुविधा थी। पर नींद कब छोड़ कर चली जाती थी, पता ही नहीं चलता था और मेरी नियति फिर मेरे सामने खड़ी होती थी मुह्न्बाये। नींद को वापिस बुलाने के लिए थकान जरूरी थी पर थक जाने के लिए जागना और काम करना जरूरी था। जागकर लेकिन क्या करते? किसी भी दार्शनिक विधि के अनुसार मुझे स्वधर्म निभाना था पर स्वधर्म क्या था? फिर वही मृत्यु का राग बजना शुरू। डर और अविश्वास से किया गया कर्म कहाँ स्वधर्म हो सकता है? सो, बात वहीं पर आकर रुक जाती थी। स्वधर्म किसी अव्यवहारिक दर्शन पर निर्मित नहीं हो सकता था। जब तक सामने मृत्यु थी, मेरे पास बाय-पास करने का कोई तरीका नहीं था। एक इंच की दूरी से तेज भागती कार से बाल-बाल बचने पर जो सनसनी पैदा होती है, भूख के डर से जो घर के पीपे भरने की लालसा पैदा होती है, 'पाप कहीं जग-जाहिर न हो जाए' का संशय कितने पाप और करवाता है- यह सारी उदाहर्नें मृत्यु के सूक्ष्म आत्मसात अन्त्र्लोक से उपज्तीं हैं। इन सबके सामने इश्वर का सवाल बेतुका सा लगना शुरू हो जाता है।
अंत में, जो शक्तिशाली है, जिसका राज्य चुनौती-हीन है, उसी का स्वामित्व बनता है और वो ईश्वर नहीं बल्कि मृत्यु है। आत्म की बात करते-करते देह-आत्म की की दुनिया में आ गिरना। एक चमत्कारिक आसुरी शक्ति है मृत्यु में। इतनी साक्षात्, सगुण, निराकार कि काफिर होने की पहली डिग्री उसी वक्त हाथ में थमा जाती है। एक नॉन-सेकुलर अनुभव के रूप में अद्वितीय, सर्वत्र व्याप्त। मैं, मेरा और मेरा शरीर- इन सब को एक ही सूत्र में पिरोता हुआ अनुभव। Dichotomy की कोई जगह नहीं। सुध बस यहीं पर खड़ी थी, बहुत देर से। आसपास बस अँधेरा था। अगर कोई मित्र थी, वो सिर्फ़ एक सहमी हुई इच्छा थी जिसके पास चलने की ताकत नहीं थी पर थोडी सी उर्जा के साथ वो जूझ रही थी।
कितनी हैरानी की बात है- ये सब मृत्यु की प्रतिध्वनियों के अहसास थे, स्वन्यम मृत्यु के नहीं। अगर कुछ मौलिक है सिवाए मृत्यु के कुछ भी नहीं पर यह मौलिक कहाँ है? जीवन के रूप हैं, सभी मृत्यु के अधीन हैं पर इस मौलिक का अनुभव कहाँ है? शायद सम्भव भी नहीं है। किसी सनसनीखेज डॉक्युमेंटरी का विषय ज़रूर हो सकता है लेकिन मृत्यु का अनुभव बयान की दुनिया में नहीं है। सर्वत्र और सर्वकालिक होने का बावजूद भी अनुभव की इकाई नहीं है।
इक्कीसवीं सदी के इंसान को इस बात पर ज़रूर आश्चर्य करना चाहिए की उसे 'लेखक की मृत्यु', 'भाषा की मृत्यु','इतिहास की मृत्यु' आदि घोषणाएं सुनने को मिलीं हैं पर वहीं 'मृत्यु की मृत्यु' की घोषणा अभी तक सुनाई नहीं दी है। क्यूं? शायद 'लेखक','भाषा' और 'इतिहास' आदि की निर्माण प्रविधि और निर्माता को लेकर एक सर्वमान्य व्योम बनाने का प्रोजेक्ट एक सत्ता तंत्र की प्रभुता (हेगेमोंय) से कभी अलग ही नहीं हो पाया। सो, इसलिए एक अविकसित भ्रूण की तरह अबोर्ट कर दिया गया पर मृत्यु न केवल अस्तित्विक सत्य के रूप में सर्वमान्य रही बल्कि हमारी चेतना के विकास पर सबसे बड़ा प्रश्न-चिन्ह बनी रही। मौत के सामने कौन सी रणनीति अपनाई जाए? क्या इस के खिलाफ अमरीका और यूरोप मिलकर कोई मिजाइल डिफेन्स सिस्टम बना सकते हैं? क्या क्लोनिंग की कोई भी किस्म मृत्यु के भय को सदा के लिए ख़त्म कर पाएगी ? ऐसे कार्यक्रमों पर हो रहे अरबों डालर क्या मृत्यु की विराटता से सहमी हुई मानवता की कहानी नहीं बयान कर रहे हैं? चौबीस घंटे मौत हमारी चेतना को डर नाम की पोटली में कैद कर के बैठी रहती है।
मृत्यु के साथ हमारा ऐसा विचित्र सम्बन्ध है जो विचार की श्रेणियों से बाहर है। यह सही है- मृत्यु निर्धारित नहीं हो सकती। यह भी सही है- मृत्यु से संवाद सम्भव नहीं पर क्या अलावा सम्बन्ध का कोई भी ऐसा प्रारूप नहीं हो सकता जिसमें मृत्यु चिंतन-यात्रा का अंश बन सके। इस ब्रह्माण्ड में जीवन की अनेकों फार्म्स हैं जो कभी न कभी जन्म लेती हैं और कभी न कभी ख़त्म हो जातीं हैं। जो उदय के अंतर्गत है, वो अस्त भी होगा। अश्वात्ठामा का सबसे वफादार उत्तराधिकारी भी ख़ुद न मरना चाहे पर मौत के सच को पल भर के लिए ही सही, स्वीकार ज़रूर करेगा। तभी उसके न मरने का संघर्ष शुरू होगा। अगर जिजीविषा हर जगह विद्यमान है, मृत्यु भी एक अटल, सर्वत्र व्याप्त होनी है। ईश्वर के बारे में अनेकों सत्य लोकप्रियता और कट्टरता के लोक में खड़े हैं, जबकि मृत्यु के बारे में एक ही सच है -यह अवश्यम्भावी है। चाहे जलाया जाए या दफनाया जाए या फिर चील-कौवों को खिला दिया जाए, मतभेद लाशों के ऊपर हैं, मरने के सच के ऊपर नहीं हैं। मैं डरता है, जीवन की एक फार्म मरती है और एक रूप दृश्य-जगत से मिट जाता है। हमेशा से ऐसा होता आया है- 'मैं' अभी भी डर रहा है, फार्म्स अभी भी लुप्त हो रहीं हैं। मृत्यू का काम बराबर जारी है। यह जो 'मैं' अभी भी डर रहा है, क्या उस का यह डर सृष्टि की प्रक्रिया में कोई भी परिवर्तन कर पाया है। बचने की लाख कोशिशें हुई होंगी, झूठ-सच बोले गए होंगे, वफा-दारियाँ बदली होंगी, बहुत कुछ हुआ होगा, इतिहास बेचारा हिमालय की तरह यूँ ही बढता गया होगा पर क्या इस सब के बावजूद कोई मूलभूत अन्तर नहीं आया। इतना सब कुछ होता रहा पर डर फ़िर भी बचा रहा। किसी भी इतिहासकार की नज़र में सबसे बड़ी मूर्खता डर ही होनी चाहिए। डर कुछ भी नहीं बदल पाया पर फिर भी बचा हुआ है। उत्तरजीविता (Survivorship) इतनी गहरी आज तक विद्यमान है - कोई भी अदालत इसके ख़िलाफ़ फ़ैसला क्या, बयान भी नहीं दे पाई है।
यही एक ऐसा बिन्दु है जो एक ही पल ऐतिहासिक होकर भी गैर-ऐतिहासिक है।

1 comment:

उमेश कुमार said...

डर और मृत्यु दोनों सत्य हैं। फ़िर भी इनसे लोग डरते है। जहाँ तक मेरा मानना है विश्व के ९०% लोग सत्य से डरते हैं। अगर मृत्यु को किसी प्रकार के झुठलाया जा सके तो लोग इससे भी नही डरेगें। मृत्यु तो एक बहाना है हकीकत यह है कि हम हर सत्य से डरते हुए अपनी जीवन की नौका को चला रहें हैं। जिस दिन हकीकत को सहनकरने की हिम्मत हमरे अंदर आ जायेगी उस दिन मृत्यु भी हमारे लिए एक खिलौने के ही समान हो जायेगे।