Sunday, June 8, 2008

बीच की चुप्पी

पिछले कुछ दिनों से इधर-उधर घूमता रहा, टहलता रहा, बिखरा रहा और शिथिल रहा। इतना कुछ हो रहा था कि किसी एक चीज़ के बारे में लिखना बहुत ही मुश्किल हो रहा था। आर्थिक चिंताओं से बचते-बचाते अर्थ-चिंतन की जो श्रृंखला शुरू की है, उस पर पहरा देने फिर से भीष्म पितामह आ गए। लगभग उनसे लड़ता हुआ, क्रोध करता हुआ मैं उनसे विवाद कर रहा हूँ।
काव्य की दुनिया के जो चन्द नायाब हीरे कहीं दूर चले गए थे, उन लोगों से फिर से नाता जोड़ पा रहा हूँ और महसूस हो रहा है कि भाषा और अनुभूति संवाद की हरेक पसली को इतना गहरे से प्रभावित करती हैं कि जहाँ-जहाँ भी हम से कोई कमी रह जाती है, वहां-वहां ही आक्षेपों की बौछार आनी शुरू हो जाती है।
उन सब के बीच कहीं बहुत देर से दबी हुई ज़मीन और पानी को लेकर एक नव्यचिंतन की शुरुआत के अलग-अलग मुहाजों और लोगों के काम को देखने की तरफ़ कुछ कोशिश कर सका। पंजाब में खेती विरासत मिशन के काम को करीब से जानना और समझना शुरू कर सका और इस मिशन की आत्मा उमेंद्र दत्त से कुछ बातचीत कर सका।
इस दौरान पालमपुर, धर्मशाला और मक्लोदगंज की यात्रा का सुख उठा पाया। इन सब के बीच यही सोच रहा था कि ऐसी कौन सी धारा है जो वाकई मेरी है।
जवाब आया कि ऐसी कोई भी नहीं जो मेरी न हो। ऐसा बहुविध आयाम क्या मेरी कमाई है या फिर मेरी ज़रूरत? अर्थ, इतिहास, मिथिहास, धर्मं, यात्रा, कविता, चराचर प्रकृति, लोक आन्दोलन, राजनीति; ऐसा कुछ भी नहीं है जो मेरी चेतना के आकाश में सहजता से न आ पाता हो। पर इस बहुविध रूपों को बहुविध वैभव में बदलने की ज़रूरत है। जब तक एक रूप दूसरे में से साक्षी नहीं तलाश पाता, कैसे कोई दृश्य उभर कर चल पाएगा? दर्शन की हदों में प्रवेश करने के लिए रूपों को कितने संबंधों का शास्त्र रचना पड़ता है! सो, लगा जैसे मेरा काम मूल रूप से एक बुनकर का काम है जो अपनी इच्छा के सभी तंतुओं को आपस में जोड़ता रहता है। रंग कितने ही क्यूं ना हों, काम कैसे रुक सकता है?

2 comments:

Udan Tashtari said...

रंग कितने ही क्यूं ना हों, काम कैसे रुक सकता है?

-बिल्कुल सहमत. इतना घूमें हैं, जरा यात्रा संस्मरण भी लाये जायें.

Amit K. Sagar said...

बहुत सही भाई. लिखते रहिये. शुभकामनायें.
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उल्टा तीर