ध्रितराष्ट्र ने भी तो गीता सुनी थी संजय के मुख से। पर ऐसा क्यूं है कि उसे वो समझ नहीं आती. इतनी ज्ञान ध्यान की बात उसे क्यूँ नहीं समझ आ रही? समझ तो आती होगी पर उसे हजम नहीं होती होगी कि यह क्या बात हुई कि कर्म भी करो और फल की इच्छा भी न करो! उसने शायद विश्वरूप भी देखा होगा पर उसने इस पर भी सवाल उठाया होगा। वो हर चीज़ में बड़ा सोच समझ कर, मोल-भाव कर के चलने वाला इन्सान है। उसे लगा होगा कि क्या यह विश्वरूप गांधारी की तरह मेरे साथ-साथ चल सकता है पक्का आसरा बन कर ? जब भी जरूरत हो, आवाज़ लगाई और लो हाथ में! उसे पता था कि कृष्णा बहुत चतुर है इसलिए उसका निष्पक्ष होना असंभव है? उसके लिए वफादारी किसी की चतुराई से भी बढ़कर है।ईश्वर भी इसी कसौटी पर खरा उतरना चाहिए, तभी तो उसे ईश्वर मान के पूजा करने का फायदा है। (पोलिटिकल इस पर्सनल के अनुसार चतुर और निष्पक्ष साथ साथ हो नहीं सकते ) ऐसे हालातों में उसके लिए गीता मात्र कचरे के सिवा कुछ भी नहीं थी। जीवन एक उपहार है या फिर एक संपत्ति? ध्रितराष्ट्र एक ऐसा व्यक्ति है जो कहता है सीधा साफ कि यह मेरी संपत्ति है। इसे जिंदा रखने और भोगने के लिए मैं सब कुछ कर सकता हूँ। अगर कर्म का फल ज़िन्दां रहना नहीं है तो क्या फायदा कर्म का और भाड़ में जाये ऐसी गीता ! मसला असल में यह है कि गीता की ज़रुरत ही उसे है जो यह मानता हैं कि कुछ ऐसा भी है जो मेरा नहीं है कम के कम अधिकार की दृष्टि से। उसके साथ मेरा रिश्ता संयम और संतुलन का होना चाहिए। यही उसके अन्दर सवाल पैदा करता है और उसी से पैदा होता है वो जो निष्पक्ष है, जिसकी बात सुनी जा सकती है पर अगर फैसला पहले ही हो चुका है कि सब कुछ मेरा है और मुझसे बढ़ कर कुछ भी नहीं है तो फिर गीता पर टाइम ख़राब करना मूर्खता है और कमाल की बात है कि सौ में से निन्यानवे बार ध्रितराष्ट्र ही जीत जाता है पर क्या करें उसे गीता का शोर सुनते रहना पड़ता है! उसके लिए प्रॉब्लम यह है कि यह कृष्ण गीता का बाजा बजाने बार बार आ जाता है, जाता ही नहीं है। उसे यहाँ हर हाल में पता करना है कि उसका कर्मफल उसे मिलेगा कि नहीं और यह साला कृष्ण बीच में अर्जुन को लेकर हर बार बैठ जाता है और कान पकाता रहता है. धृतराष्ट्र के लिए गीता एक पक्की बोरियत है और कभी न साथ छोड़ने वाली बोरियत है.
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Thursday, August 7, 2014
Tuesday, February 26, 2008
शून्य
यह शून्य क्या है? बहुत बार शून्य को एक अंकगणित की रचना से आगे देखने की कोशिश नहीं होती या फिर यूँ कहें कि हो नहीं पाती क्योंकि शून्य उस गतिविधि का, जिसमे हम रत हैं, की अपूर्णता का हमेशा ख्याल करवाता है। यहाँ 'अपूर्णता' शब्द की बजाए यूँ कहना भी ठीक होगा कि वो पूर्णता के भान को ही तोड़ता है। इससे भी बेहतर यह कहना होगा कि शून्य तर्कसंगत होने की प्रणाली की नींव में एक छेद बनकर बैठ जाता है जो उस तर्क की विकासशीलता पर एक निरंतर प्रश्न चिन्ह की तरह ताकता रहता है। यह भी कह सकते हैं कि तर्क घबराता है शून्य से। यह घभ्राहट तर्क का स्वभाव हो या न हो पर क्या इसका छिपाव नहीं है?
यह एक विचित्र बात है कि गणित के रूप में एक निरंतर उपस्तिथि के बावजूद सामान्य जीवन-दर्शन में शून्य की कोई जगह नहीं होती। हमारे सपनों में शून्य का अस्तित्व एक निषेध की तरह होता है। राजनितिक विचारधाराओं में इसकी छाया तक को पास नहीं फटकने दिया जाता। बाज़ारों में तो छोडिये, हमारे घरों में भी शून्य के लिए कोई स्थान नहीं है। शायद हमारे संसार की रचना का कोई भी तारतम्य शून्य को मानने के लिए राजी नहीं है क्योंकि शून्य यानी 'जो नहीं है' को 'है' की श्रेणी में माना ही क्यूं जाए! यह बहुत ही सर्वमान्य सिद्धांत है जिसको लेकर वाद-विवाद की कोई जगह नहीं मानी जाती।
पर .........................
जब-जब रामू गाँधी (रामचंद्र गाँधी) की दर्शन-शाला (फिलोसोफी वर्कशॉप) की बात याद आती है तो जो बल उन्होंने शून्य पर दिया है, वो बार-बार स्मृति में उभर आता है। एक बार उनकी क्लास में कुछ कुर्सियाँ पड़ी थीं, एक कुर्सी छोड़ कर बाकी सब पर लोग बैठे थे और सब का एक-एक करके परिचे हो रहा था। एक- एक करते-करते जब आख़िर में खाली कुर्सी तक पहुंचे तो रामू गाँधी बोले,"अब मिलिए शून्य जी से "। उसके बाद की हसीं में गंभीरता गायब नहीं थी।
एक दार्शनिक की शून्य के बारे में यह कथनी करनी के लोक में एक बड़ी तीखी और गहरी सेंध की तरह आज भी भिन्धि हूई है। जब-जब अपनी ज़िंदगी के सुचारू रूप पर मुग्ध होता हूँ , अभी उसकी खुशी के कुछ पल गुजरे ही होते हैं और वो सेंध मेरे सामने आकर ठहर जाती है। मैं ख़ुद को एक रूपहीन डर के भीतर कैद महसूस करता हूँ। शायद शून्य और डर- यह दो समानार्थी शब्द मान लिए गए हैं। शायद यही कारण है जिसकी वजह से शून्य के ऊपर चिंतन शुरू होने से पहले ही खेल खत्म हो जाता है। जबकि सच केवल इतना है, शून्य बस 'नहीं है' और जो नहीं है, उससे डरने की भी क्या ज़रूरत है? पर हमारी ज़िन्दगिओं का दुखांत यह है -इस मूलभूत गड़बड़ को ही हमने अपने यथार्थ का आधार बना लिया है। हमारे पूर्वाग्रहों की गिनती चाहे जितनी भी क्यूं न हो, पर उनकी सबकी मूल प्रकृति शून्य-विरोधी है क्योंकि शून्य पूर्वाग्रह नहीं है, मात्र आग्रह है, जिसका हम आमतौर पर मुहं मोड़ कर एक चुपचाप वापसी के रूप में जवाब देते हैं।
आज अगर कोई सबसे बड़ी चुनौती है तौ वो इसी आग्रह का उत्तर देने की है। देहात्मबोध इस आग्रह से पीठ किए बैठा है। जबकि गहरे में वो जानता है की वो बस एक नमक की गुडिया है। जो देर-सवेर काल के पानियों में घुल जाएगा। किस में? उसमे 'जो नहीं' है। सो, चिरंतन शरण किस्में है? शून्य में। पर आज उसी को नकार कर हम जी रहे हैं। एक बड़ी ही सरल अंक-गणितीय इकूअशन है।
१ + ० = १
२ + ० = २
इस इकूअशन के दायीं और बांयी और की संख्याएँ गणितीय सिद्धांतों के अनुसार बराबर हैं, पर जिस तरह गणित में जमा शून्य लिखना सम्भव है, ठीक उसी तरह क्या जमा शून्य के सच को स्वीकार कर सकते हैं? मुझे ऐसा लगता है की उपरोक्त सच किसी न किसी रूपक के तौर पर हमारे जीवन में कार्यशील रहता है जिसकी अनदेखी देहात्मबोध को एक कैद बना देती है पर इसके विपरीत उसकी स्वीकृति उसी कैद का एंटी-डॉट बन जाती है। ध्यान रहे यहाँ पर रेखांकन सिर्फ़ स्वीकृति का है। बल्कि कैद या एंटी-डॉट का नहीं । क्योंकि दोनों ही पूर्वाग्रहों की दुनिया के शब्द हैं, जबकि शून्य मात्र आग्रह की दुनिया का जिसका कोई रूप नहीं , कोई आकार नहीं। अगर कोई गुन है तौ बस पुकारने का गुन । बस इतनी ही सम्पदा है उसकी पोटली में। इस गरीब को अपने राज्लोक में थोडी सी जगह देने से हमारा क्या बिगड़ जाएगा?
यह एक विचित्र बात है कि गणित के रूप में एक निरंतर उपस्तिथि के बावजूद सामान्य जीवन-दर्शन में शून्य की कोई जगह नहीं होती। हमारे सपनों में शून्य का अस्तित्व एक निषेध की तरह होता है। राजनितिक विचारधाराओं में इसकी छाया तक को पास नहीं फटकने दिया जाता। बाज़ारों में तो छोडिये, हमारे घरों में भी शून्य के लिए कोई स्थान नहीं है। शायद हमारे संसार की रचना का कोई भी तारतम्य शून्य को मानने के लिए राजी नहीं है क्योंकि शून्य यानी 'जो नहीं है' को 'है' की श्रेणी में माना ही क्यूं जाए! यह बहुत ही सर्वमान्य सिद्धांत है जिसको लेकर वाद-विवाद की कोई जगह नहीं मानी जाती।
पर .........................
जब-जब रामू गाँधी (रामचंद्र गाँधी) की दर्शन-शाला (फिलोसोफी वर्कशॉप) की बात याद आती है तो जो बल उन्होंने शून्य पर दिया है, वो बार-बार स्मृति में उभर आता है। एक बार उनकी क्लास में कुछ कुर्सियाँ पड़ी थीं, एक कुर्सी छोड़ कर बाकी सब पर लोग बैठे थे और सब का एक-एक करके परिचे हो रहा था। एक- एक करते-करते जब आख़िर में खाली कुर्सी तक पहुंचे तो रामू गाँधी बोले,"अब मिलिए शून्य जी से "। उसके बाद की हसीं में गंभीरता गायब नहीं थी।
एक दार्शनिक की शून्य के बारे में यह कथनी करनी के लोक में एक बड़ी तीखी और गहरी सेंध की तरह आज भी भिन्धि हूई है। जब-जब अपनी ज़िंदगी के सुचारू रूप पर मुग्ध होता हूँ , अभी उसकी खुशी के कुछ पल गुजरे ही होते हैं और वो सेंध मेरे सामने आकर ठहर जाती है। मैं ख़ुद को एक रूपहीन डर के भीतर कैद महसूस करता हूँ। शायद शून्य और डर- यह दो समानार्थी शब्द मान लिए गए हैं। शायद यही कारण है जिसकी वजह से शून्य के ऊपर चिंतन शुरू होने से पहले ही खेल खत्म हो जाता है। जबकि सच केवल इतना है, शून्य बस 'नहीं है' और जो नहीं है, उससे डरने की भी क्या ज़रूरत है? पर हमारी ज़िन्दगिओं का दुखांत यह है -इस मूलभूत गड़बड़ को ही हमने अपने यथार्थ का आधार बना लिया है। हमारे पूर्वाग्रहों की गिनती चाहे जितनी भी क्यूं न हो, पर उनकी सबकी मूल प्रकृति शून्य-विरोधी है क्योंकि शून्य पूर्वाग्रह नहीं है, मात्र आग्रह है, जिसका हम आमतौर पर मुहं मोड़ कर एक चुपचाप वापसी के रूप में जवाब देते हैं।
आज अगर कोई सबसे बड़ी चुनौती है तौ वो इसी आग्रह का उत्तर देने की है। देहात्मबोध इस आग्रह से पीठ किए बैठा है। जबकि गहरे में वो जानता है की वो बस एक नमक की गुडिया है। जो देर-सवेर काल के पानियों में घुल जाएगा। किस में? उसमे 'जो नहीं' है। सो, चिरंतन शरण किस्में है? शून्य में। पर आज उसी को नकार कर हम जी रहे हैं। एक बड़ी ही सरल अंक-गणितीय इकूअशन है।
१ + ० = १
२ + ० = २
इस इकूअशन के दायीं और बांयी और की संख्याएँ गणितीय सिद्धांतों के अनुसार बराबर हैं, पर जिस तरह गणित में जमा शून्य लिखना सम्भव है, ठीक उसी तरह क्या जमा शून्य के सच को स्वीकार कर सकते हैं? मुझे ऐसा लगता है की उपरोक्त सच किसी न किसी रूपक के तौर पर हमारे जीवन में कार्यशील रहता है जिसकी अनदेखी देहात्मबोध को एक कैद बना देती है पर इसके विपरीत उसकी स्वीकृति उसी कैद का एंटी-डॉट बन जाती है। ध्यान रहे यहाँ पर रेखांकन सिर्फ़ स्वीकृति का है। बल्कि कैद या एंटी-डॉट का नहीं । क्योंकि दोनों ही पूर्वाग्रहों की दुनिया के शब्द हैं, जबकि शून्य मात्र आग्रह की दुनिया का जिसका कोई रूप नहीं , कोई आकार नहीं। अगर कोई गुन है तौ बस पुकारने का गुन । बस इतनी ही सम्पदा है उसकी पोटली में। इस गरीब को अपने राज्लोक में थोडी सी जगह देने से हमारा क्या बिगड़ जाएगा?
Monday, January 14, 2008
भारतीय चिंतन की कन्धराओं से
पिछले एक लंबे समय से दर्शन की गलियों से गुजरता रहा हूँ। कई बार किसी नुक्कड़ पर ठहरा तो बस ठहरा ही रह गया। फिर अचानक शून्यों की एक भीड़ आती थी और मुझे आगे को धकेल देती थी। यात्रा फिर से शुरू हो जाती थी। इस बीच एक सवाल हर थोड़ी देर बाद आकर सिर पर बैठ जाता था कि क्या दर्शन की कोई भारतीय पहचान भी हो सकती है? हालांकि मुझे पिछले सौ सालों में लिखे गए भारतीय चिंतन के काफी दिग्गजों की जानकारी है पर मामला सिर्फ इतना नहीं है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, श्री अरविंदो घोष, मह्रिषी दयानंद, महात्मा गाँधी, सावरकर, ऍम ऍन रोय, जयप्रकाश नारायण, जे कृष्णामूर्ति, आचार्य रजनीश, स्वामी रामतीर्थ, के जे शाह और रामचंद्र गाँधी की रचनाओं को पढ़ने का मौका मिला है पर ऐसा कुछ अजीब है भारतीय होने के चक्कर में कि हम अपने दर्शन की परम्पराओं को अपनी समकालीनता में देखने में लगभग असमर्थ हैं। गाँधी को लेकर तो एक विशेष किस्म की अपराधिक कुंठा तो नज़र आती ही है। परन्तु शायद ही कोई ऐसा अन्य चिन्तक हमारे सामने हो जिसकी बात करके हम अपने भारतीय और मानव होने के सवाल पर चिंतन भी कर सकें। चाहे वो पर्यावरण का मुद्दा हो, चाहे वो अर्थव्यवस्था और वैश्वीकरण का सवाल हो, चाहे वो धर्म और राजनीति का मसला हो, चाहे वो मीडिया और इसकी मसालेदार खबरों का तूफ़ान हो, चाहे वो एकोंणमुखी नैतिकता का प्रश्न हो, हर बार हमारे पास जवाब के रुप में भारतीय दार्शनिक संदर्भ कहीं नज़र ही नहीं आ रहा । क्या इस देश के चिन्तक इतने गए-गुज़रे थे कि आज हम उनके काम के किसी भी पक्ष का अपनी समस्याओं को समझने के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकते! हज़ारों सालों की प्रतिभा को जिंदा रखने वाले लोग एक समय में आकर अचानक अप्रासंगिक हो जाते हैं। राजनीति के लिए अप्रासंगिक , संस्कृति के लिए अप्रासंगिक, साहित्य के लिए , सिनेमा के लिए अप्रासंगिक ! और तो छोडिये कहीं वामपंथी भी ऍम एन रोय या फिर जयप्रकाश नारायण की बात करते नज़र नहीं आते और न ही दक्षिणपंथी कभी अरविंदो घोष की बात करते नज़र आते हैं। रामचंद्र गाँधी को हमने दार्शनिक की कुर्सी पर तो चढाया ही नहीं है। उसे दिल्ली का पागल कहकर रास्ते पर उसकी याद को भटकने छोड़ दिया है।
एक गहरा अकाल है किसी भी विचार की परम्परा का।
ऐसी स्तिथि में क्या किसी भी चिंतन परम्परा की बात हो सकती है? अनकही दीवारों में सिमटे तर्क लहुलुहान हुए बैठे रहते हैं। संवाद की कोशिशें संसारिकता को अर्थहीन साबित करती चली जाती हैं। हम तलाश करते हैं एक और वाद की । और विचारधाराओं के बाज़ार में सेंसेक्स फिर बढ़ना-घटना शुरू कर देता है। बुद्धिजीवी अपनी जीविका का इंतजाम करने फिर निकल लेते हैं नए माल की खरीद-दारी करने। बुद्धि के आयाम में यही एक रोड़ा है जो सिवाय एक रास्ते के और कोई विकल्प नहीं छोड़ता?
वो है मृत्यु !
एक सामाजिकता की मृत्यु, एक इतिहास की मृत्यु और एक आशावाद की मृत्यु!
मात्र मृत्यु एक कल्प के रुप में सामने खड़ी होती है और आप को सिर्फ एक पल दिया जाता है फ़ैसला करने के लिए।
इतिहास का आसरा काम नहीं आता, राष्ट्रीयता का झांसा भी नहीं चलता और विचारधारा का साथ भी नहीं रहता।
बचती है तो बस एक इच्छा !
नवजात इच्छा! जिसका धर्म अभी बनेगा, जिसका कर्म अभी बनेगा और जिसकी नियति अभी बनेगी।
क्या पता भारतीय बने, क्या पता अभारतीय बने और क्या पता वो भारतीय होने के किसी सांचे के अन्दर आने को भी राज़ी न हो!
अगर कहीं किसी पहचान की शुरुआत हो सकती है, तो उस इच्छा के ही रुप से हो सकती है।
एक गहरा अकाल है किसी भी विचार की परम्परा का।
ऐसी स्तिथि में क्या किसी भी चिंतन परम्परा की बात हो सकती है? अनकही दीवारों में सिमटे तर्क लहुलुहान हुए बैठे रहते हैं। संवाद की कोशिशें संसारिकता को अर्थहीन साबित करती चली जाती हैं। हम तलाश करते हैं एक और वाद की । और विचारधाराओं के बाज़ार में सेंसेक्स फिर बढ़ना-घटना शुरू कर देता है। बुद्धिजीवी अपनी जीविका का इंतजाम करने फिर निकल लेते हैं नए माल की खरीद-दारी करने। बुद्धि के आयाम में यही एक रोड़ा है जो सिवाय एक रास्ते के और कोई विकल्प नहीं छोड़ता?
वो है मृत्यु !
एक सामाजिकता की मृत्यु, एक इतिहास की मृत्यु और एक आशावाद की मृत्यु!
मात्र मृत्यु एक कल्प के रुप में सामने खड़ी होती है और आप को सिर्फ एक पल दिया जाता है फ़ैसला करने के लिए।
इतिहास का आसरा काम नहीं आता, राष्ट्रीयता का झांसा भी नहीं चलता और विचारधारा का साथ भी नहीं रहता।
बचती है तो बस एक इच्छा !
नवजात इच्छा! जिसका धर्म अभी बनेगा, जिसका कर्म अभी बनेगा और जिसकी नियति अभी बनेगी।
क्या पता भारतीय बने, क्या पता अभारतीय बने और क्या पता वो भारतीय होने के किसी सांचे के अन्दर आने को भी राज़ी न हो!
अगर कहीं किसी पहचान की शुरुआत हो सकती है, तो उस इच्छा के ही रुप से हो सकती है।
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