Thursday, October 4, 2007

थोड़ी सी कविताएं -3


माई रोटी दे


देखी सुगबुगाती चूल्हे की आग
थपथप करती आटे की नमी
हाथों की नरमी
छाती की गरमी
कुछ पकना था
हल्का सा जलना था
उठनी थी महक हवा में
बढ़नी थी भूख
और सुननी थी एक आवाज़
माई रोटी दे

5 comments:

Delectable.Disposition said...

short and sweet ...
enow to resuscitate me abt ghar ka khaana which m missing a lot :(

piyush
http://peeyushkakkar.blogspot.com/

sarbjot said...

The poem provides the true warmth of the relation of mother and child. And provides the live picture of a chullah and a mother,who is making roties with the fire of love for their loved ones and waiting for a call for Roti that is 'MAI ROTI DE'.

Really very touching poem.

shri said...

a sweet but deep and touching poem.

umesh kumar said...

मैंने यह कविता पढ़ी,यह कविता एक माँ को इस रुप मे दिखाती है कि वह एक प्यार की साक्षात् मूर्ति है। बदलते मानव जीवन में भी माँ अपने रूप को नही बदल सकती है। क्योंकि उसके अन्दर ममता का एक महासागर होता है। यही कारण है भारत आज भी अपने मान मर्यादा को बनाए रखा है।

anilpandey said...

यह कविता न सिर्फ माता कि पुत्र के प्रति उसके तीव्र अनुराग को व्यक्त कराती है अपितु हमें वास्तविकता के तह तक पहुँचने के लिए मजबूर कर देती है। माँ किसी भी हालत में क्यों न रहे। यदि बेटे की रखवाली करनी है तो उसी को ही करनी है। चाहे वह जिस भी हालत और हालत में हो। चाहे वह रोटी पका रही हो या खुद रोटी कि तरह ही पक रही हो। मैं इस बात से तो सहमत हूँ कि माँ की ममता है और वह उस ममता के वसीभूत होकर ही ऐसा कर रही है। पर क्या ऎसी सोंच परिवर्तित नहीं हो सकती। क्या कवी और लेखक जन किसी ऐसे चरित्र का निर्माण नहीं कर सकते कि जिससे वह उस काम में व्यस्त हो और कोई दूसरा आकर उस लड़के को रोटी दे सके?