Wednesday, October 17, 2007

थोड़ी सी कविताएं-9


रेत


रेत फैली है सागर किनारे
निडर है, आश्वस्त है, शांत है

पर
बच्चे उसे डराना जानते हैं
रेत में बोते हैं जब सपने
मुट्ठी -दर-मुट्ठी सपने खडे होते हैं
छोटे-छोटे हाथ
पहचान देते हैं रेत को
'कुछ भी नहीं' से 'कुछ' बना देते हैं रेत को
रेत भी देखने लगती है सपने
चाहने लगती है सितारों को घर में बसाना
आबाद हो जाना

सपनो के घरों में
और सपने बसते हैं
तभी ना जाने क्यूँ
चला आता है सागर
सपने समेट वापस लौट जाता है

रेत बच्चों से बहुत डरती है

7 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया-

Mired Mirage said...

सुन्दर रचना है ।
घुघूती बासूती

Ashish said...

हे मेरे बंधु,
वापिस संपर्क में आने से बहुत खुश हूँ और आपकी कविताएं पढ़कर वाकई मज़ा आ रहा है। मैंने हाल में कुछ भी नहीं लिखा। पर आपका लिखा पढ़ कर कुछ लिखने का मन तो कर रहा है। जहां तक बात रही तस्वीर की तो यह मेरी मनपसंद तस्वीर है। मेरी तीन साल की भांजी ने मेरे मोबाइल से खेलते हुए ये तस्वीर निकाली। उसका मास्टरपीस लगा रखा है, इससे ज़्यादा खूबसूरत किसी तस्वीर में नहीं लग सकता। वैसे आपकी तारीफ़ के लिए शुक्रिया।

mohit mittal said...

destruction is the rule of nature. but our duty is to dream the reconstruction of the very destructible and accomplish the task before the wave of destruction arrives to shatter the foundation of what we want to achieve.

mohit mittal said...

after reading ur poem a beautiful poem has come to my mind which we read many years ago in school in punjabi by Prof. Mohan Singh. its a great work in terms of the depth with which it views the life from the perspective of a gardener who endeavors his entire life and waits for the ultimate moment when his efforts will bear the fruits. He dreams for the spring but when it finally arrives he is nowhere to enjoy the fruits of his harvest.

anilpandey said...

काश ! ये सागर ही न होते और मन मर्जी के फलते फूलते वे सपने

अभय तिवारी said...

भई वाह..