Friday, November 23, 2007

थोड़ी सी कविताएं-14


आक्रमण-वेला


तुम्हारे पदचिन्ह खोजती
सून्घती हुई तुम्हारी नसों में बहता खून
भनक लेती हुई तुम्हारी कड़कड़ाती हुई हड्डिओं की
वो काली बिल्ली आ पहुंची है
देखती है एक भरपूर निगाह से अपने शिकार को
एक उफान से भरे है उसके पंजे
हल्के-हल्के झुक रहे हैं उसके कंधे
देखो! वो फैला रही है अपने पैरों की नीचे की ज़मीन
उसकी नाक के बाल बेताब हैं
लाल रंग में धुलने को
बस एक कदम 'गर और
लड़खड़ाए तुम
बिजली की तरह झपटेगी वो तुम पर
और फाड़ डालेगी तुम्हे रेशा-रेशा

1 comment:

बाल किशन said...

तुम्हारे पदचिन्ह खोजती
सून्घती हुई तुम्हारी नसों में बहता खून
भनक लेती हुई तुम्हारी कड़कड़ाती हुई हड्डिओं की
वो काली बिल्ली आ पहुंची है
बिल्ली है या कुत्ते और शेर की मिलीभगत?