Saturday, December 8, 2007

थोडी सी कविताएं -15


मृत्यु
-१

मृत्यु कभी पक्के तौर पर घर नहीं बनाती
वो तगड़ी घुमक्कड़ है
बस एक रात ठहरती है
अपना काम करती है
और अगली सुबह
फिर आवारा हो जाती है
अगर खुली रखो तुम आँखें
तो देख पाओगे तुम उसे अपनी आंखों के पास मंडराते हुए
दिन में वो तुम्हे रिझाएगी
रात में तुम उसके सामने गिड़गिड़ाओगे
कमाल की खिलाड़ी है वो
हारती नहीं कभी वो

देखो! वो फैल रही है रात-दर-रात

3 comments:

नीरज गोस्वामी said...

क्या कहूँ सुनील जी तारीफ के लिए उपयुक्त शब्द नहीं मिल रहे .
बेहतरीन रचना है ये आप की. बधाई.
नीरज

Sarbjot Kaur said...

Really death is just a next step of life towards unknown journey.And it closes down the chapters of life....which was full of so many happy and sad moments,with unending aspirations, put a full-stop to future.
Nobody can experience death on its own and its meeting with onself,it never bothers.
Only loved one's experience Death, the emptiness, when they revisit the history of gone person.

jagmohan said...

Indeed wonderful poem
Jagmohan Singh