Friday, December 14, 2007

थोडी सी कविताएं-16


चाँद की रात में


चाँद की रात में
लिखे दुःख
होठों ने होठों पर

मंद-हल्की , झीनी-भीनी
रोशनी में
मुस्कराया था तुम्हारे गालों पर
वो दुःख
जो टपका था उम्मीद के विपरीत
सब रास्ते काटता खड़ा था एकदम बीच

फैला था गीलापन
जिसमे फिसले थे मेरे होंठ तैरते हुए
समंदर की ओर
बालों से थी गुजरी ऊंगलियाँ
सर्पीली सी
आंखों में थी रात
चमक-सी
बाहों में रुका था वक़्त
सट कर खड़ा था तुम्हारी छाती से मेरा दिल
और सहला रहा था मेरे दुखों को तुम्हारा दुःख

बीस सालों में बदल चुकी थी ज़िंदगी
दूरियां थी फैली मीलों ओर
मगर हो लिए थे कच्चे रास्ते दो जवान दुःख
पीछे भूल
पुराने दुःख

3 comments:

Sarbjot Kaur said...

The poem "Chand ki Raat Mein" is really a very good creation,which is full of emotions,love, sharing of happiness & sadness,togetherness etc.,words are so many.The poem reveals not only romantic picture of love but also carries one to deep into the soul of love.
All the words are naturally coming from soul and harmoniously woven to make it the lovely/unique creation of poetry.
very touching...

Pramod Kumar Kush ' tanha ' said...

sunder rachna ke liye badhayee.
aagay bhi likhtay rahiyega.

Pramod Kumar Kush'tanha'

Umesh Bawa said...

हर रात एक आभास होता है,
की अब भी कुह्ह बाकी है,
बारिश की उन बूंदों में,
सूर्य की तीखी किरणों में,
देखता किसको हु मैं,

पर याद मुझे है अब ये आया
के पंछी भी तो चहचहाते है,
दिल भी तो काम
धडकना है.....