Thursday, April 9, 2009

बाघ-4

केदारनाथ सिंघ की कविता-श्रृंखला 'बाघ' कई सालों से प्रिय कविताओं का अद्भुत संग्रह रहा है। इसके बहु-आयामी अर्थों ने हमेशा बाँध कर रखा है। इच्छा थी कि इसका पॉडकास्ट शुरू करुँ। पेश है
बाघ-4 का पोडकास्ट
इस विशाल देश के
धुर उत्तर में
एक छोटा सा खंडहर है
किसी प्राचीन नगर का
जहाँ उसके वैभव के दिनों में
कभी -कभी आते थे बुद्ध
कभी-कभी आ जाता था
बाघ भी

दोनों अलग-अलग आते थे
अगर बुद्ध आते थे पूरब से
तो बाघ का क्या
कभी वह पश्चिम से आ जाता था
कभी किसी ऐसी गुमनाम दिशा से
जिसका किसी को
आभास तक नहीं होता था

पर कभी-कभी दोनों का
हो जाता था सामना
फिर बाघ आँख उठा
देखता था बुद्ध को
और बुद्ध सर झुका
बढ़ जाते थे आगे

इस तरह चलता रहा
महान जीवन उस छोटे से नगर का
बुद्ध की करूणा
और बाघ के आतंक की
एक-दूसरे को काटती हुई
दोहरी छाया में

वहां लोगों का ख्याल था
की बुद्ध समझतें हैं
बाघ की भाषा
पर बेचारे बाघ के लिए
बुद्ध की पाली
घास की तरह सुंदर थी
और एकदम अखाद्य

इस तरह दोनों के बीच
एक अजब-सा रिश्ता था
जहाँ एक तरफ़ भूख ही भूख थी
दूसरी तरफ़ करूणा ही करूणा
और दोनों के बीच
कोई पुल नहीं था

पर कभी-कभी रातों में
जब हिमालय की चोटियों पर
गिरती थी बर्फ
और नगर में चलती थीं तेज़ हवाएं
तो नगर-वासी सोचते थे -
इसी झोंके में कहीं सिहरते होंगे बुद्ध
और कितना अजब है
की इसी झोंके में
कहीं हिलता होगा बाघ भी!

2 comments:

Abhishek Mishra said...

सुन्दर कविता.

संगीता पुरी said...

अच्‍छी रचना है ...