Thursday, August 7, 2014

महाभारत आज भी -2

ध्रितराष्ट्र ने भी तो गीता सुनी थी संजय के मुख से। पर ऐसा क्यूं है कि उसे वो समझ नहीं आती. इतनी ज्ञान ध्यान की बात उसे क्यूँ नहीं समझ आ रही? समझ तो आती होगी पर उसे हजम नहीं होती होगी कि यह क्या बात हुई कि कर्म भी करो और फल की इच्छा भी न करो! उसने शायद विश्वरूप भी देखा होगा पर उसने इस पर भी सवाल उठाया होगा। वो हर चीज़ में बड़ा सोच समझ कर, मोल-भाव कर के चलने वाला इन्सान है। उसे लगा होगा कि क्या यह विश्वरूप गांधारी की तरह मेरे साथ-साथ चल सकता है पक्का आसरा बन कर ? जब भी जरूरत हो, आवाज़ लगाई और लो हाथ में! उसे पता था कि कृष्णा बहुत चतुर है इसलिए उसका निष्पक्ष होना असंभव है? उसके लिए वफादारी किसी की चतुराई से भी बढ़कर है।ईश्वर भी इसी कसौटी पर खरा उतरना चाहिए, तभी तो उसे ईश्वर मान के पूजा करने का फायदा है। (पोलिटिकल इस पर्सनल के अनुसार चतुर और निष्पक्ष साथ साथ हो नहीं सकते ) ऐसे हालातों में उसके लिए गीता मात्र कचरे के सिवा कुछ भी नहीं थी।  जीवन एक उपहार है या फिर एक संपत्ति? ध्रितराष्ट्र एक ऐसा व्यक्ति है जो कहता है सीधा साफ कि यह मेरी संपत्ति है।  इसे जिंदा रखने और भोगने के लिए मैं सब कुछ कर सकता हूँ। अगर कर्म का फल ज़िन्दां रहना नहीं है तो क्या फायदा कर्म का और भाड़ में जाये ऐसी गीता ! मसला असल में यह है कि गीता की ज़रुरत ही उसे है जो यह मानता हैं कि कुछ ऐसा भी है जो मेरा नहीं है कम के कम अधिकार की दृष्टि से। उसके साथ मेरा रिश्ता संयम और संतुलन का होना चाहिए। यही उसके अन्दर सवाल पैदा करता है और उसी से पैदा होता है वो जो निष्पक्ष है, जिसकी बात सुनी जा सकती है पर अगर फैसला पहले ही हो चुका है कि सब कुछ मेरा है और मुझसे बढ़ कर कुछ भी नहीं है तो फिर गीता पर टाइम ख़राब करना मूर्खता है और कमाल की बात है कि सौ में से निन्यानवे बार ध्रितराष्ट्र ही जीत जाता है पर क्या करें उसे गीता का शोर सुनते रहना पड़ता है! उसके लिए प्रॉब्लम यह है कि यह कृष्ण गीता का बाजा बजाने बार बार आ जाता है, जाता ही नहीं है। उसे यहाँ हर हाल में पता करना है कि उसका कर्मफल उसे मिलेगा कि नहीं और यह साला कृष्ण बीच में अर्जुन को लेकर हर बार बैठ जाता है और  कान पकाता  रहता  है. धृतराष्ट्र के  लिए गीता एक पक्की बोरियत है और  कभी न साथ छोड़ने वाली बोरियत है.

1 comment:

deepak bhalla said...

शून्य होना,स्वार्थरहित होना, अपने सिवा भी कुछ और देखना गीता के मर्म को समझने की पहली शर्त. करते तुम हो पर करने वाला कोई और ऐसा भाव , तो फिर कृषण हर पल साथ. पर उसका साथ चाहिये किसको.उससे सब कुछ चाहिये पर वो नहीं. हर पल शीशे के सामने कौन रहे. फिर वो तो कभी नहीं जिसके लिए सब कुछ वो खुद ही हो.